शनिवार, 12 मार्च 2022

holashtak kab se shuru hai 2022

Holashtak kab se lag rahe hain 2022 ?

होलाष्टक कब से लग रहे हैं २०२२ ?

फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को होलिका दहन होता है और उसके अगले दिन चैत्र माह की प्रतिपदा के दिन होली खेली जाती है।होलिका दहन से 8 दिन पहले से होलिका दहन तक का समय होलाष्टक का होता है। पंचांग के अनुसार, इस वर्ष फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का प्रारंभ 10 मार्च दिन गुरुवार को सुबह  02 बजकर 56 मिनट पर हो रहा है। यह तिथि 11 मार्च को प्रात: 05 बजकर 34 मिनट तक मान्य है। अष्टमी तिथि 10 मार्च को प्रात: शुरु हो रही है, तो होलाष्टक का प्रारंभ भी  10 मार्च से हो रहे हैं जो 17 मार्च तक चलेंगे। 
holashtak kab se shuru hai 2022


होलाष्टक शुरू होते ही होलिका दहन की तैयारी शुरू हो जाती है, कई प्रदेशों में इसी दिन होलिका दहन वाले स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर उसमें सूखी लकड़ी, उपले व होलिका दहन के लिए प्रह्लाद और उनकी बुआ के र्रोप में दो डंडे स्थापित कर दिए जाते हैं। कई प्रदेशों में इस दौरान एक पेड़ की शाखा को काट कर जमीन पर लगाते हैं और उसमे रंगीन कपडा बाँध देते हैं।  इसे प्रह्लाद के प्रतीक के रूप में स्थापित किया जाता है, उनके कष्ट को याद करते हुए मांगलिक कार्य नहीं किये जाते हैं। 

होलाष्टक को माने जाने के कारण के रूप में दो पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं --

हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलादभगवान् विष्णु का अनन्य भक्त था, लेकिन हिरण्यकश्यप को अपने पुत्र का भगवान विष्णु की भक्ति करना पसंद नहीं था। उसने अपने पुत्र को मारने के लिएआठ दिनों तक काफी जतन किये थे। लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से हिरण्यकश्यप प्रहलाद को नहीं मार सका, आठवें दिन प्रहलाद की बुआ होलिका प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठी और वरदान के बावजूद खुद जल गयी और प्रह्लाद जीवित रह गया। 

दुसरी पौराणिक कथा के अनुसार, कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या भंग कर दी थी, जिससे नाराज होकर भगवान् शिव ने उन्हें फाल्गुन की अष्टमी तिथि के दिन भस्म कर दिया था। कामदेव की पत्नी रति के द्वारा शिव की आराधना और कामदेव को पुर्नजीवित करने की याचना को उन्होंने इसी दिन स्वीकार किया था। भगवान शिव के इस निर्णय से दुखी भक्त खुश हुए थे और एक सप्ताह बाद धूमधाम से इस दिन को मनाया था। 

होलाष्टक की कहानियों के जड़ में जाएँ , तो दो बातें समझ में आई है

पहला, यह  कि 8 दिनों तक प्रह्लाद कष्ट में रहें, कामदेव कष्ट में रहें, तो हमें इस बात का शोक मानना चाहिए और कोई भी ख़ुशी वाले काम नहीं करने चाहिए। इसलिए होलाष्टक में 8 दिन तक मांगलिक कार्यों को करना मना है, जैसे नामकरण संस्कार, जनेऊ  मुंडन, विवाह, नामकरण, अन्नप्राशन सहित 16 संस्कारों में से कोई भी इन 8 दिनों के बीच नहीं करना चाहिए। नया वाहन न खरीदें, नए व्यवसाय की शुरुआत भी न करें,  किसी मकान या प्लॉट की रजिस्ट्री भी न कराएं। टाले जाने वाले काम को टाल दें, आवश्यक कार्य को करते रहें। 

दूसरा, यह कि दोनों की तपस्या फलीभूत हुई थी तो इस समय कोई भी पूजा-पाठ, दान-धर्म, तपस्या की जा सकी है। होलाष्टक में पूरे समय मेंआप हनुमान जी के भक्त हैं तो हनुमान मंदिर में दीपक जलाकर हनुमान चालीसा क पथ कर सकते हैं, भगवान शिव शंकर की पूजा, ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जाप करें। भगवान भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप बालगोपाल की भी विशेष पूजा करनी चाहिए। होलाष्टक में भगवान श्री हरि विष्णु की भी विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है।  माना जाता है कि जीवन में आ रही परेशानियों से छुटकारा पाने के लिए इस दिन नरसिंह भगवान की पूजा और इन दिनों में ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करते रहना चाहिए। इस दौरान की पूजा प्रार्थना से बहुत लाभ होता है। 

कुछ ज्योतिषियों का यह मानना है कि होलाष्टक का समय ज्योतिषीय दृष्टि से भी कमजोर होता है, 'गत्यात्मक ज्योतिष इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता। सनातन धर्म  में होली (Holi) महापर्व का विशेष महत्व है और इसकी शुरुआत होलाष्टक से प्रारम्भ होकर धुलेंडी तक रहती है।  इस त्यौहार में न तो खर्च का तनाव देखा गया है और न ही रिश्तों का। छोटे-बड़े सब इस समय एक हो जाया करते हैं, कभी भी कोई दुष्प्रभाव नहीं देखा गया। 

फाल्गुन महीने की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन  किया जाता है. इस साल फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा 17 मार्च को पड़ रही हैं, तो होलिका दहन 17 मार्च 2022 को होना चाहिए. उसके अगले दिन चैत्र मास की प्रथमा तिथि को रंग वाली होली खेली जाती है,इसका अर्थ है कि इस साल रंग वाली होली 18 मार्च 2022 को खेली जाएगी. यदि सूर्योदय की प्रथमा तिथि को होली खेलने के उपयुक्त माना जाये तो होली 19  मार्च को भी मनाई जा सकती है।  


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